2027 में हरिद्वार में ‘अर्ध कुंभ’ होगा या ‘कुंभ’? सबसे बड़ा खुलासा!

धर्मनगरी हरिद्वार में साल 2027 में होने वाले महाआयोजन को लेकर अभी से ही संतों के बीच विवाद गहराने लगा है। मेले के आयोजन में अभी वक्त है, लेकिन अखाड़ों के बीच ‘वर्चस्व की लड़ाई’ शुरू हो चुकी है। सबसे बड़ा सवाल और विवाद का केंद्र यह है कि 2027 के आयोजन को ‘अर्धकुंभ’ कहा जाएगा या ‘कुंभ’? नाम को लेकर छिड़ी इस जंग ने अखाड़ों की आंतरिक राजनीति को गरमा दिया है, जिससे मेला प्रशासन की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।
नाम पर नहीं, वर्चस्व पर है जंग
सूत्रों के अनुसार, अखाड़ों के बंद दरवाजों के पीछे भीषण आंतरिक कलह चल रही है। यह लड़ाई सिर्फ आयोजन के नामकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संत समाज में अपना प्रभाव जमाने की कवायद है। 2027 के मेले से पहले ही संतों के बीच प्रतीकात्मक रूप से ‘तलवारें’ खिंच गई हैं।
प्रमुख संतों के बीच जुबानी जंग तेज
इस पूरे विवाद के केंद्र में दो प्रमुख संत और उनके धड़े हैं। स्वामी रूपेंद्र प्रकाश और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रविन्द्र पुरी के बीच तीखी जुबानी जंग चल रही है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ आमने-सामने हैं, जिससे अखाड़ों का माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है।
अखाड़ों के भीतर ‘पावर गेम’
इस विवाद ने अखाड़ों की आंतरिक सत्ता संरचना पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक बड़ा मुद्दा यह उभरकर आया है कि अखाड़ों में निर्णय लेने और बोलने का असली अधिकार किसका है? क्या महामंडलेश्वरों के अधिकारों को सीमित किया जा रहा है और अखाड़ा सचिव हावी हो रहे हैं? यह ‘पावर गेम’ संतों के बीच असंतोष का बड़ा कारण बन रहा है।
प्रशासन के सामने चुनौती
संतों की यह आपसी गुटबाजी और वर्चस्व की लड़ाई मेला प्रशासन के लिए सिरदर्द साबित हो सकती है। प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह इस आंतरिक कलह के बीच आगामी महाआयोजन की तैयारियों को निर्विघ्न रूप से कैसे आगे बढ़ाए। हरिद्वार की पवित्र धरती पर चल रही सत्ता की यह लड़ाई आने वाले दिनों में क्या करवट लेती है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं।

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